दिल्ली मेरी यादें: साढ़े बारह रुपये का पास, एक बीड़ी का बंडल और दिल्ली विवि का वो कमरा

नईदिल्ली,मनुत्यागी।अशोकचक्रधरनेबालसाहित्य,प्रौढ़एवंनवसाक्षरसाहित्य,समीक्षा,अनुवाद,पटकथाआदिअनेकोंविधाओंमेंलेखनकिया।फिल्म,धारावाहिकमेंलेखन,निर्देशनकेसाथकविसम्मेलनोंकेलोकप्रियव्यक्तित्वरहे।हिंदीसलाहकारसमिति,ऊर्जामंत्रालय,भारतसरकार,हिमाचलकलासंस्कृतिऔरभाषाअकादमीकेभूतपूर्वसदस्यकेपदोंपररहचुकेहैं।वैसेतोपहलापरिचयइसशहरसेदसवर्षकीउम्रमेंसन्61मेंहुआथा।जबमैंमेरठसेअपनेपिताकेसाथइसनायाबशहरकोदेखनेआयाथा।हममेरठसेखासकरगोलचासिनेमामेंफिल्मदेखनेआएथे।तभीकनॉटप्लेस,बालभवनकीरेलगाड़ी,डॉलम्यूजियम,आकाशवाणीपरहमघूमेथे।बिलकुलअपनेनामकेअनुकूलयेइंद्रप्रस्थमुझेइंद्रलोकहीलगाथा।

रहिमनधागाप्रेमका...मततोड़ोचटकाए..

फिरकुछसालबादजबजिंदगीमेंप्रवेशपरीक्षाओंकादौरआयातोअपनेचाचाजीकेयहांजोजंगपुरामेंरहतेथे,वहांआगए।वोवहांकिराएकेमकानमेंरहतेथे।यहांजंगपुरामेंमुझेसबसेखासलगानिजामुद्दीनरेलवेस्टेशनकेपासस्थितअब्दुलरहीमखान-ए-खानाकामकबरा।मुझेयहांहरतरफरहीमकीमौजूदगीनजरआतीथी,उनकेदोहे।संघर्षकेउसदौरकाशांतिऔरसुकूनवहींतलाशताथा।अभीकलकीहीबातहैरहीमकेमकबराकेसामनेसेगुजररहाथातोदेखाकिवहांपुनरुद्धारकाकामचलरहाहै,एककमीमहसूसहुई,उसमेंरहीमकेदोहे...उनकीरचनाओंकोभीरेखांकितकरनाचाहिए।कितनाअद्भुत साहित्यरचाउन्होंनेजोसदियोंसेसाथचलरहाहै...दोहरायाजारहाहै।रहिमनधागाप्रेमका...मततोड़ोचटकाए...।

पुरानीदिल्लीदेखीहै...बढ़ती...बदलती...संवरती

दिल्लीकोइनप्रेमकेधागोंमेंगुंथारहनाचाहिएइन्हेंचटकानानहींचाहिए।इन्हेंस्मृतियोंकेपटलपरसजाकररखनाजरूरीहै।मैंनेदिलोंसेदिलोंकोमिलातीदिल्लीदेखीहै,पुरानीदिल्लीदेखीहै...बढ़ती...बदलती...संवरतीदिल्लीदेखीहै।उत्तमनगरकीओरबढ़तीदिल्लीदेखीहैऔरइसछोरपरआजादपुरकेबादशालीमारबागसेआगेकोचलतीदिल्लीदेखीहै।पूरीदिल्लीधीरे-धीरेनन्हेपांवोंसेउम्रकेसाथपलीऔरबढ़ीहै।बहरहाल1971मेंमैंदिल्लीआगयाथाऔरसन्72मेंमैंनेसत्यवतीकॉलेजमेंपढ़ानाशुरूकरदिया।कुछदिनतकसबठीकथालेकिनतबउम्रऐसीथी...औरतबवामपंथीविचारधारा...सामाजिक मुद्दोंसेजुड़ीहोतीथी।बनगएथेक्रांतिकारी।कॉलेजमेंयहबातरासनहींआई।सामाजिकमुद्दोंपरकॉलेजकीअव्यवस्थाओंपरआवाजउठानेकेसाथथियेटरभीकियाकरताथा।

साहित्यकारोंकाजमघटलगनेलगा

फिरकुछसमयबाददिल्लीविश्वविद्यालयकेआर्टफैकल्टीकारूमनंबर22ऐसीजगहबनगयाजहांसाहित्यकारोंकाजमघटलगनेलगा।प्रगतिनामकीगोष्ठीहोनेलगी।यहसिलसिलासन्75तकचलाथा।उन्हींदिनोंहरियाणाकेअध्यापकोंनेबहुतबड़ीहड़तालकीथी,देशभरकेशिक्षकउनकेसमर्थनमेंआएथे।मैंनेभीमनबनालियावहांजानेका।उनदिनोंसत्यवतीकॉलेजकेप्रिंसिपलथेडॉहलधर,उन्होंनेमेरेजानेपरविरोधजतायालेकिनमैंवहांचलागया।औरइसीपरउन्होंनेमुझेआगेकॉलेजमेंपढ़ानेकाअवसरनहींदिया।

उनदिनोंरहनेकाठिकानादिल्लीविविहोताथा

अबयहमेरेसंघर्षकादौरथालेकिनमुझेवहअपनास्वर्णकाललगताहैक्योंकिउसनेइतनाकुछसिखाया,लिखायाजिसकाआजतकधनीहूं।पैसेकीथोड़ीतंगीथीतोउनदिनोंरहनेकाठिकानाभीदिल्लीविविमेंहीहोताथा।कईसारेअध्यापकथे।अबसभीअविवाहितथेतोएकहीसाथरहतेथे।कभीवहांनागार्जुनआरहेहैंकभीकोईबड़ेलेखकआरहेहैं।सुधीशपचौरीमेरेअच्छेमित्रथे।मुझेबीड़ीपीनेकीबहुततगड़ीतलबथी।

एकबार5रुपयेकाकोटलेआयाथा

रोजकाएकबंडलतोहोताहीथा,इसकाजिम्माथासुधीशजीपरक्योंकिवोकमारहेथे।वोमेरामहीनेकाकोटायानीएकपैकेटदेदेतेथे,उसमेंबंडलहोतेथे25महीनेमेंदिनहुए30,शुरूमेंतोपूराकोटाचलताथाबसजबमाहकेपांचदिनबचतेतोडोजथोड़ीकमकरदेताथाताकिकोटामहीनेकेअंततकचला सकूं।अद्भुतदिनथेवो।अरेजामामस्जिदपरबढ़िया-बढ़ियापुरानेकपड़ोंकीदुकानलगतीथीं,वहांसेमैंएकबार5रुपयेकाकोटलेआयाथाबढ़ियापीसथाउसेकभीनागार्जुनपहनते,कभीमैंऔरसुधीशजी।कोईभीअभावमेंनहींथासबमस्तमगनहोकरजीतेथे।एकदिनमेरेपासविविकेउसरूमकीचाबीनहींथीऔरबाकीमित्रसबबाहरथे,तोमैंवहांविविकेबाहरफुटपाथपरहीसोगया।लेकिनउसजिदंगीमेंअभावकेबावजूदआनंदथा।

मुद्रिकाबससेवाकोमुद्रिकानाममैंनेहीदियाथा

मुझेदिल्लीकीबसोंसेबेहदलगावहै।मैंनेअध्यापकरहतेभीबससेहीवोछात्रोंवालापासबनवायाहुआथा।सन्75कीबातहोगीजामियामेंमेरीअध्यापककीनौकरीलगगईथीमैंजनकपुरीसेतीनबसेंबदलकरआताथा।बेहदरोमांचितहोताथाबसकासफर।तभीतोकईसारेकविताएंमेरीइन्हींबसोंकीयात्राओंपरभीहैं।तबकनॉटप्लेसकोसेंटरमानकरएकसुगमबससेवाभीशुरूहुईथीजिसकामकसदथाकेंद्रसेपरिधिसेछूनेवालीसेवा।औरदूसरीमुद्रिका,वृत्तबनानेवालीमुद्रिकासेवा।आपकोएकऔरदिलचस्पबातबताताहूं,यहश्रेयलेनेकीबातनहीं,मुद्रिकाबससेवाकोमुद्रिकानाममैंनेहीदियाथा।दरअसलएकलेखकथेरमेशकौशिकवोकमलापतित्रिपाठीकोभीजानतेथे।एकदिनउनकेयहांएकगोष्ठीथीतोतभीमैंनेबातों-बातोंमेंमैंनेउन्हेंयहमुद्रिकानामसुझायाऔरउन्होंनेकमलापतिजीकोबतादियाउन्होंनेतयकरदिया।उनदिनोंबसोंकेनंबरभी1से10नंबरतकहीहोतेथे।